उम्मीद का सिरा, एक नहीं तो दूसरा

डूबते को तिनके का सहारा… तिनका भला क्या सहारा दे सकता है… लेकिन जो उम्मीद छिपी होती है उस तिनके में, वह बड़े काम की होती है। बड़ी से बड़ी आफत, भीषण से भीषण मुसीबत को आप हंसते-हंसते पार कर सकते हैं अगर उम्मीद की कोई छोटी सी लौ भी कहीं आपकी नजर में बनी रहे।

उम्मीद के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि उसका बड़ा आकार जरूरी नहीं होता। विशाल तो चुनौतियां होती हैं, इंसान तो पांच-छह फुट का ही होता है। लेकिन कहते हैं, जो इंसान अपने सामने खड़ी चुनौतियों को खुद से बड़ा मान लेता है, वह बहुत छोटा होता है। अगर कोई पर्वतारोही एवरेस्ट को खुद से ऊंचा मान ले तो वह कभी उसे फतह नहीं कर पाएगा।

लेकिन यह एक तथ्य है कि एवरेस्ट की ऊंचाई के सामने पांच-छह फुट की कोई बिसात नहीं होती। इसलिए चुनौती को नापते हुए उसके बरक्स इंसान को नहीं, उसके हौसले को खड़ा किया जाता है।

और इंसान के हौसले को जिजीविषा देती है उसके भीतर जलती उम्मीद की लौ। सवाल यह है कि उम्मीद की इस जलती लौ को तेल कहां से मिलता है?

यह सवाल तब से मेरा पीछा कर रहा है, जब से मैंने होश संभाला है। ऐसा कोई जवाब अब तक नहीं मिला है, जिस पर पूरा भरोसा हो जाए, जिसे अंतिम मान सकूं। तात्कालिक जवाब जरूर मिले, जो कुछ दिन साथ रहे। उन दिनों में लगता रहा कि हां मेरी उम्मीद के दीये को भी तेल वहीं से मिल रहा है।

लेकिन कुछ समय बाद तेल का वह स्रोत ही गायब हो गया। कुछ समय में दूसरा कोई स्रोत निकल आया। कभी यह स्रोत मां-पिता और नानी-दादी की उक्तियों के रूप में हाजिर रहा तो कभी पुस्तकों में लिखी विद्वानों-दार्शनिकों की विद्वत्तापूर्ण बातों में। कभी यह आइडियॉलजी के रूप में मुझे उपलब्ध रहा तो कभी धार्मिक विश्वासों के रूप में।

खुद ईश्वर ने भी कम नहीं भरमाया। कभी मन में यह दृढ विश्वास बना रहा कि ईश्वर की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं खड़कता तो इतनी बड़ी मुसीबत मेरे सिर पर अपनी मर्जी से तो नहीं आएगी। और जब ईश्वर की मर्जी से यह मुसीबत आई है तो इसे मुसीबत क्यों मानना। निश्चित रूप से ईश्वर मेरा भला चाहता है, इसलिए उसने इस मुसीबत के रूप में मेरे लिए यह अवसर भेजा है। मुझे बिना डरे इस अवसर के सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल का तरीका ढूंढना चाहिए।

कभी यह ख्याल भी आया कि विज्ञान की इतनी प्रगति के बाद भी इंसान को कमजोर पलों में ताकत के लिए किसी काल्पनिक ईश्वर की शरण लेनी पड़े, यह क्या कोई अच्छी स्थिति है? अगले ही पल मन तर्क का दूसरा जाल फेंकता कि आखिर तुम्हें कल्पना से इतनी चिढ़ क्यों है? वह भी तो प्रकृति की दी हुई एक शक्ति है जो इंसानों को मिली है। हर जीव-जंतु को तो ऐसी शक्ति नहीं मिली है कि वह ब्रह्मांड की समस्त ऊर्जा को समाहित करते हुए उसके सर्वश्रेष्ठ रूप की कल्पना करे और उसे अपने साथ या खुद को उसके साथ जुड़ा हुआ मान ले?

तर्क-वितर्क-कुतर्क का यह सिलसिला आज भी जारी है, शायद आजीवन चलता रहेगा। मार्के की बात यह है कि इस दौरान उम्मीद का कोई न कोई स्रोत किसी न किसी रूप में बरकरार रहा है। बस यह स्रोत बना रहे, चाहे जिस रूप में भी रहे, तो दुनिया की खूबसूरती बनी रहेगी, है ना?

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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